माओवाद से मुक्ति के बाद भी अंतागढ़ में फीका रहा आजादी का जश्न, आखिर जिम्मेदार कौन जनप्रतिनिधि या प्रशासन…?
जनता पूछ रही—जश्न फीका क्यों?
अंतागढ़। बस्तर में माओवाद के लंबे साए से बाहर निकलने के बाद इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस को लेकर लोगों में विशेष उत्साह और उम्मीद थी। 31 मार्च 2026 के बाद बदले हालात में लोगों को उम्मीद थी कि स्वतंत्रता दिवस का आयोजन ऐतिहासिक भव्यता के साथ होगा। लेकिन अंतागढ़ में आयोजित कार्यक्रम की फीकी तस्वीर ने स्थानीय लोगों को निराश कर दिया और स्थानीय जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।

क्षेत्रवासियों का कहना है कि जब बस्तर भय और आतंक की छाया से निकलकर नई उम्मीद की ओर बढ़ रहा है, तब अंतागढ़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए था। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार उन्मुक्त खेल मैदान में ऐसा आयोजन होगा, जिसे वर्षों तक याद रखा जाएगा। मगर अपेक्षित स्तर का उत्साह और भव्यता नजर नहीं आने से लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। लोगों का कहना है कि अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र से जुड़े प्रमुख जनप्रतिनिधियों से जनता को उम्मीद थी कि वे माओवाद के बाद बदले वातावरण को देखते हुए स्वतंत्रता दिवस को ऐतिहासिक बनाने के लिए विशेष पहल करेंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षाओं के अनुरूप आयोजन नहीं दिखाई देने से जनता पूछ रही है कि आखिर अंतागढ़ को वह महत्व क्यों नहीं मिल पाया, जिसका वह हकदार है?
26 जनवरी के बाद फिर उठे सवाल
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि गणतंत्र दिवस के आयोजन को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं। अब स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी यदि वही स्थिति दोहराई गई है, तो यह महज आयोजन की कमी नहीं बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं और जनप्रतिनिधियों की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है। लोगों का आक्रोश इस बात को लेकर भी है कि जहां बस्तर के अन्य हिस्सों में तिरंगा यात्रा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विभिन्न आयोजनों के माध्यम से आजादी का उत्सव उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है, वहीं अंतागढ़ में अपेक्षित उत्साह का अभाव क्यों नजर आया।
जनता पूछ रही—जश्न फीका क्यों?
क्षेत्रवासियों के बीच अब सवाल उठ रहा है कि क्या अंतागढ़ राजनीतिक और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो रहा है? क्या स्थानीय स्तर पर राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन को लेकर पर्याप्त तैयारी और इच्छाशक्ति का अभाव है? यदि माओवाद के दौर की भय की मानसिकता से बाहर निकलकर बस्तर नई दिशा में बढ़ रहा है, तो अंतागढ़ में भी उसी आत्मविश्वास और गौरव की झलक क्यों नहीं दिखाई दी?स्थानीय लोगों का कहना है कि माओवाद की बेड़ियां टूटना केवल सुरक्षा की उपलब्धि नहीं, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक पुनर्जागरण का अवसर भी है। ऐसे समय में राष्ट्रीय पर्वों को भव्यता के साथ मनाना जनता के मन में विश्वास और नई ऊर्जा पैदा कर सकता है। अब जनता स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जवाब चाहती है कि अंतागढ़ में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन अपेक्षाओं के अनुरूप क्यों नहीं हो सका? तैयारियों में कमी कहां रही? और क्या भविष्य में राष्ट्रीय पर्वों को लेकर अंतागढ़ को वह सम्मान और प्राथमिकता मिलेगी, जिसकी जनता लंबे समय से अपेक्षा कर रही है?
यह सवाल किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह अंतागढ़ की पहचान, सम्मान और भविष्य से जुड़ा सवाल है। जनता का स्पष्ट संदेश है—माओवाद के बाद मिली नई आजादी का उत्सव अंतागढ़ में भी पूरे गौरव, उत्साह और भव्यता के साथ दिखाई देना चाहिए।

