रावघाट माइंस क्षेत्र में बढ़ता असंतोष: अधूरे वादों, कम दरों और अनदेखी से नाराज़ ग्रामीणों द्वारा सरकार व BSP को खुली चेतावनी
स्कूल-अस्पताल अब तक अधूरे, DMF/CSR खर्च पर सवाल, 478 रु. परिवहन दर को बताया अव्यावहारिक — 31 मार्च तक कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन तय
कांकेर (उ. बस्तर), : रावघाट माइंस परियोजना से प्रभावित क्षेत्रों में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई अब खुलकर सामने आ रही है। राजाराव ग्राम माइंस श्रमिक विकास समिति द्वारा मुख्यमंत्री और भिलाई स्टील प्लांट (BSP) प्रबंधन को सौंपे गए विस्तृत ज्ञापन में प्रशासनिक उदासीनता, अधूरे वादे और आर्थिक शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।ज्ञापन से साफ संकेत मिलता है कि जिस विकास मॉडल के नाम पर खनन परियोजना चलाई जा रही है, उसमें स्थानीय लोगों की मूलभूत जरूरतें और अधिकार लगातार हाशिए पर हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य—सिर्फ कागजों तक सीमित?
सबसे बड़ा सवाल DAV स्कूल और अस्पताल निर्माण को लेकर उठाया गया है। BSP द्वारा पूर्व में स्वीकृति दिए जाने के बावजूद अब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं होना, सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। स्थानीय समिति का आरोप है कि इस देरी का खामियाजा बच्चों की शिक्षा और आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। एक ओर सरकार “विकास” के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करवा पा रही—यह विरोधाभास अब लोगों के गुस्से में बदल रहा है।
DMF और CSR फंड: पारदर्शिता पर सवाल
ज्ञापन में DMF (District Mineral Foundation) और CSR फंड के उपयोग पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। समिति के अनुसार, इन फंड्स का 70% हिस्सा प्रभावित क्षेत्रों में खर्च ही नहीं हो रहा है। इसका सीधा असर सड़क मरम्मत, जल संरक्षण, वन संरक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब खनन से सबसे अधिक प्रभावित यही क्षेत्र हैं, तो फिर फंड का उपयोग कहीं और क्यों और कैसे किया जा रहा है?
478 रुपये प्रति टन दर—विकास या आर्थिक दबाव?
भिलाई स्टील प्लांट द्वारा हाल ही में जारी टेंडर में 478 रुपये प्रति टन परिवहन दर तय की गई है, जिसे स्थानीय परिवहनकर्ताओं और श्रमिकों ने “अव्यावहारिक और शोषणकारी” बताया है। ज्ञापन में स्पष्ट कहा गया है कि वर्तमान समय में डीजल की कीमत, वाहन मेंटेनेंस, मजदूरी और खराब सड़कों की स्थिति को देखते हुए यह दर लागत भी नहीं निकाल पा रही। ऐसे में यह निर्णय स्थानीय ट्रक मालिकों और मजदूरों को आर्थिक रूप से कमजोर करने वाला साबित हो सकता है। समिति का आरोप है कि बिना स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रभावित समुदाय से चर्चा किए इस तरह के फैसले थोपे जा रहे हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत है।
स्थानीय युवाओं के साथ भेदभाव का आरोप
रोजगार और तकनीकी शिक्षा के मुद्दे पर भी नाराजगी सामने आई है। समिति ने कहा कि स्थानीय बेरोजगार युवाओं को ITI और अन्य तकनीकी संस्थानों में प्रवेश के लिए कोई विशेष छूट या कोटा नहीं दिया जा रहा, जबकि खनन का सीधा असर इन्हीं क्षेत्रों के युवाओं पर पड़ता है। यह स्थिति न केवल कौशल विकास को रोक रही है, बल्कि भविष्य में बेरोजगारी और असंतोष को भी बढ़ा सकती है। प्रशासन को सीधी चेतावनी: अब “सहनशीलता” की सीमा खत्म ज्ञापन का सबसे तीखा हिस्सा वह है, जिसमें समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि 31 मार्च 2026 तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और परिवहन संघों द्वारा चरणबद्ध आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और चक्काजाम किया जाएगा। यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि अब स्थानीय स्तर पर असंतोष सिर्फ शिकायत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़क पर उतरने की तैयारी भी पूरी है।

निष्कर्ष: विकास बनाम विस्थापन का पुराना सवाल फिर खड़ा
रावघाट माइंस क्षेत्र का यह मामला एक बार फिर उस बड़े सवाल को सामने लाता है—क्या खनन आधारित विकास मॉडल वास्तव में स्थानीय लोगों के हित में है, या सिर्फ संसाधनों के दोहन तक सीमित है? यदि प्रशासन और BSP समय रहते इन मुद्दों पर पारदर्शी और संवेदनशील रवैया नहीं अपनाते, तो यह असंतोष एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

