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कोयलीबेड़ा से अंतागढ़ तक सुलगती आंदोलन की चिंगारी; ग्रामीणों ने फूंका सांसद, विधायक व जनपद अध्यक्षा का पुतला

नारायणपुर-अंतागढ़ मुख्य मार्ग पर चक्काजाम, थम गए सैकड़ों वाहनों के पहिए

7 दिनों से जारी 10 सूत्रीय आंदोलन हुआ उग्र, प्रशासन की ‘चुप्पी’ से भड़का आक्रोश

वोट बैंक की राजनीति का आरोप: “ब्लॉक मुख्यालय की वापसी तक जारी रहेगी निर्णायक जंग”

अंतागढ़/कोयलीबेड़ा।
सुदूर अंचल कोयलीबेड़ा में पिछले एक सप्ताह से बुनियादी सुविधाओं और हक की लड़ाई लड़ रही जनता का आक्रोश अब जिला और ब्लॉक मुख्यालय की दहलीज तक पहुंच गया है। शासन-प्रशासन की लगातार अनदेखी और उदासीनता से नाराज सैकड़ों ग्रामीणों का जत्था मंगलवार को कोयलीबेड़ा से करीब 28 किलोमीटर दूर अंतागढ़ पहुंच गया। आंदोलित ग्रामीणों ने न केवल नारायणपुर-अंतागढ़ मुख्य मार्ग को पूरी तरह बाधित कर चक्काजाम कर दिया, बल्कि शाम तक प्रशासन की ओर से कोई पहल न होते देख उग्र रुख अख्तियार कर लिया। आक्रोशित जनता ने सांसद भोजराज नाग, अंतागढ़ विधायक विक्रम उसेंडी और कोयलीबेड़ा जनपद अध्यक्ष श्यामबत्ती मंडावी का पुतला दहन कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।
थम गईं रफ्तारें, यात्री और मरीज होते रहे परेशान
मंगलवार सुबह से ही कोयलीबेड़ा क्षेत्र से ट्रैक्टरों, गाड़ियों और पैदल ही ग्रामीणों, महिलाओं और बुजुर्गों का हुजूम अंतागढ़ पहुंचने लगा था। देखते ही देखते आंदोलनकारियों ने नारायणपुर-अंतागढ़ मुख्य मार्ग पर तंबू तान दिए और सड़क को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। इस चक्काजाम के कारण सड़क के दोनों ओर छोटे-बड़े वाहनों, यात्री बसों और मालवाहकों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। घंटों तक यातायात ठप रहने से आम यात्रियों, महिलाओं, बच्चों और गंभीर मरीजों को भीषण गर्मी में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई लोग मजबूरी में तपती धूप में पैदल ही अपने गंतव्य की ओर रवाना होने को मजबूर दिखे।

इन मुख्य मुद्दों पर आर-पार की लड़ाई: 10 सूत्रीय मांगें

ग्रामीण पिछले सात दिनों से अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर अड़े हुए हैं। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि सुदूर अंचल होने के कारण आज तक उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

  • ब्लॉक मुख्यालय की पुनः स्थापना: कोयलीबेड़ा क्षेत्र में ब्लॉक मुख्यालय को वापस लाया जाए, ताकि जनता को भटकना न पड़े।
  • बुनियादी सुविधाएं: क्षेत्र के गांवों में पक्की सड़कें, शुद्ध पेयजल और बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हो।
  • स्वास्थ्य व शिक्षा: स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, डॉक्टरों की पदस्थापना और जर्जर स्कूलों का जीर्णोद्धार किया जाए।
    “जनप्रतिनिधि कर रहे वोट बैंक की राजनीति, क्षेत्र को धकेला पीछे”
    आंदोलन के दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए अनेक स्थानीय वक्ताओं ने क्षेत्र के शीर्ष जनप्रतिनिधियों पर तीखे प्रहार किए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि “क्षेत्र के जनप्रतिनिधि जनता के हितों से अधिक अपने राजनीतिक लाभ-हानि का गणित बिठाने में लगे हैं। नेताओं को डर है कि यदि कोयलीबेड़ा ब्लॉक मुख्यालय की वापसी होती है, तो आने वाले चुनावों में उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी संकीर्ण और स्वार्थपूर्ण राजनीति के कारण क्षेत्र को विकास की दौड़ में जानबूझकर पीछे धकेला जा रहा है।”

नेताओं ने कहा कि मुख्यालय न होने से आम जनता को छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए दूर-दराज भटकना पड़ता है, जिससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पा रहा है।
प्रशासनिक व्यवस्था कटघरे में, अफसरों की ‘उदासीनता’ पर उठे सवाल
इस बड़े आंदोलन ने क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की भारी कमी है। समय रहते समस्याओं का समाधान न होने के कारण ही आज जनता सड़क पर उतरने को मजबूर हुई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि समाचार लिखे जाने तक प्रशासन की ओर से आंदोलनकारियों से बातचीत करने या मार्ग बहाल कराने की कोई ठोस पहल नहीं देखी गई, जिससे स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है।

जब तक मांग पूरी नहीं, तब तक पीछे नहीं हटेंगे: ग्रामीण

पुतला दहन के बाद ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यह आंदोलन अब थमने वाला नहीं है। उन्होंने कहा, “हम शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज सरकार तक पहुंचा रहे थे, लेकिन हमें मजबूर किया गया। अब क्षेत्र की जनता जाग चुकी है। जब तक हमारी 10 सूत्रीय मांगें पूरी नहीं होंगी और ब्लॉक मुख्यालय की वापसी नहीं होगी, यह अनिश्चितकालीन आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।”