जनता के आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखना दुर्भाग्यपूर्ण: विनोद उसेंडी
कोयलीबेड़ा आंदोलन पर गरमाई सियासत : जनपद सदस्य ने भाजपा जिला अध्यक्ष के बयान को बताया दुर्भाग्यपूर्ण। यह साजिश नहीं, जनता की पीड़ा का आंदोलन’
अंतागढ़ / कोयलीबेड़ा।
कोयलीबेड़ा क्षेत्रवासियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रीय समस्याओं और अपनी १० सूत्रीय मांगों को लेकर किया गया आंदोलन भले ही एसडीएम के आश्वासन के बाद समाप्त हो गया हो, लेकिन इस पर सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। आंदोलन को लेकर अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा जिला अध्यक्ष महेश जैन द्वारा एक टीवी चैनल पर इस जनआंदोलन को ‘संविधान विरोधी’, ‘गुंडागर्दी’ तथा ‘कांग्रेस व आम आदमी पार्टी की साजिश’ करार दिए जाने पर जनपद पंचायत सदस्य विनोद उसेंडी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने भाजपा जिला अध्यक्ष के इस बयान को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और क्षेत्र की जनता का अपमान बताया है।
सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले हुआ शांतिपूर्ण आंदोलन

जनपद सदस्य विनोद उसेंडी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले लड़ा गया एक शुद्ध जनआंदोलन था। इसमें कोयलीबेड़ा क्षेत्र की १८ पंचायतों के सरपंच, ४ जनपद सदस्य, १ जिला पंचायत सदस्य सहित ६८ गांवों के गायता, पटेल और हजारों की संख्या में ग्रामीण शामिल थे। अपनी जायज मांगों को लेकर ग्रामीण २७ मई से शांतिपूर्ण ढंग से धरने पर बैठे थे।
उपेक्षा के बाद जनता ने लिया चक्का जाम का फैसला
उसेंडी ने कहा कि छह दिनों तक कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी में धरने पर बैठे रहने के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई। जब आंदोलनकारियों की आवाज अनसुनी कर दी गई, तब क्षेत्र की जनता ने विवश होकर सामूहिक निर्णय लिया और २ जून से अंतागढ़ में चक्का जाम आंदोलन शुरू किया। यह निर्णय क्षेत्र की जनता की पीड़ा और वर्षों की उपेक्षा का परिणाम था, न कि किसी राजनीतिक दल की साजिश।
रायपुर में १२ घंटे इंतजार के बाद भी नहीं मिले मुख्यमंत्री
क्षेत्र की अनदेखी पर दर्द साझा करते हुए जनपद सदस्य ने बताया कि विगत १६ मार्च २०२६ को क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी समस्याओं को लेकर रायपुर पहुंचा था। मुख्यमंत्री से मुलाकात की उम्मीद में जनप्रतिनिधियों ने लगभग १२ घंटे तक इंतजार किया, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी और सभी को निराश होकर लौटना पड़ा। वर्षों से आवेदन, ज्ञापन और निवेदन के माध्यम से इन समस्याओं को उठाया जा रहा है, लेकिन आज तक समाधान नहीं हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समस्याओं का समाधान इतना ही आसान था, तो फिर बीते २० वर्षों से क्षेत्र की जनता इन मूलभूत समस्याओं से क्यों जूझ रही है?
सांसद और विधायक की चुप्पी पर उठाए सवाल
विनोद उसेंडी ने स्थानीय सांसद और विधायक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि ६८ गांवों के ग्रामीण इस भीषण गर्मी में लगातार आठ दिनों तक सड़क पर बैठे रहे, लेकिन क्षेत्र के विधायक और सांसद ने आंदोलन स्थल पर आकर जनता से संवाद करने तक की जहमत नहीं उठाई। आंदोलन और चक्का जाम के दबाव में प्रशासन द्वारा केवल लिखित आश्वासन दिया गया है, जबकि अधिकांश मांगें आज भी अधूरी हैं।
उन्होंने जनता की ओर से चुने हुए जनप्रतिनिधियों से सीधे सवाल किए हैं:
“जब जनता अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतर चुकी है, तब क्षेत्र के विधायक और सांसद जनता के बीच आकर संवाद क्यों नहीं कर रहे हैं? आखिर जनता से मिलने और उनकी बात सुनने में उन्हें किस बात का डर है? यह प्रश्न ६८ गांवों की जनता का है, जो अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से जवाब चाहती है।”
अंत में उसेंडी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जनता की इस बुलंद आवाज को राजनीति का नाम देकर दबाया नहीं जा सकता। जनहित की मांगों का त्वरित और स्थाई समाधान ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

