नदी पार कर शव ले जाने को मजबूर ग्रामीण, अंतागढ़ के कढ़ाईखोदरा का नदी पारा आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर
बारिश के दिनों में ब्लॉक मुख्यालय से कट जाता है संपर्क, करीब 12-13 घरों की आबादी बनी हुई है परेशानी
अंतागढ़। अंतागढ़ क्षेत्र में शनिवार को सामने आया एक दृश्य ग्रामीण अंचलों में बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत को बयां करने वाला रहा। महिला, पुरुष और बच्चों समेत ग्रामीण एक शव को कंधे पर उठाकर नदी पार करते नजर आए। यह दृश्य देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदी पारा में रहने वाले ग्रामीणों को सामान्य दिनों में ही नहीं, बल्कि जीवन के सबसे कठिन समय में भी किस तरह की परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।
जानकारी लेने पर पता चला कि यह मामला अंतागढ़ मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित ग्राम कढ़ाईखोदरा के नदी पारा का है। कढ़ाईखोदरा डेम के समीप स्थित इस पारा में करीब 12 से 13 घर हैं। बताया जाता है कि यह पारा नदी के उस पार बसा हुआ है और बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण यहां रहने वाले ग्रामीणों का ब्लॉक मुख्यालय सहित आसपास के क्षेत्रों से संपर्क प्रभावित हो जाता है।
शव को कंधे पर लेकर पार करनी पड़ी नदी
शनिवार को जब ग्रामीण एक शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जा रहे थे, तब उन्हें नदी पार करने के लिए अर्थी को कंधे पर उठाकर पानी के बीच से गुजरना पड़ा। इस दौरान महिला और पुरुष ग्रामीणों के साथ बच्चे भी मौजूद थे। यह तस्वीर केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि नदी पारा में रहने वाले उन परिवारों की मजबूरी को सामने लाती है, जो लंबे समय से आवागमन की कठिनाइयों के बीच जीवन गुजार रहे हैं।ग्रामीणों के लिए नदी पार करना कोई असामान्य बात नहीं है। रोजमर्रा की जरूरतों, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए भी उन्हें परिस्थितियों के अनुसार नदी पार करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
कम आबादी के कारण पुल निर्माण की जटिलता
ग्रामीणों की परेशानी को समझने के साथ-साथ इस क्षेत्र की भौगोलिक और व्यावहारिक स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नदी पारा में अपेक्षाकृत कम संख्या में परिवार निवास करते हैं। ऐसे में जिस स्थान पर पुल निर्माण की जरूरत महसूस होती है, वहां बड़ी लागत आने की संभावना है। स्थानीय स्तर पर यह भी माना जाता है कि प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण उक्त स्थान पर पुल निर्माण आसान नहीं होगा।यही वजह है कि ग्रामीणों के सामने एक बड़ी दुविधा है। उनकी जरूरत वास्तविक है, लेकिन आबादी कम होने और निर्माण की संभावित भारी लागत के कारण बड़े पुल की मांग को शासन-प्रशासन के समक्ष प्रभावी तरीके से रखना उनके लिए चुनौती बना हुआ है।
प्राथमिक शाला है, लेकिन आवागमन अब भी चुनौती
नदी पारा में प्राथमिक शाला भी संचालित होने की जानकारी है। ऐसे में बरसात के दौरान नदी के बढ़े जलस्तर का असर बच्चों और शिक्षकों के आवागमन पर भी पड़ सकता है। यदि नदी का बहाव तेज हो जाए तो ग्रामीणों के साथ स्कूली बच्चों की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन जाती है।
पुल नहीं तो वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत
ग्रामीणों की समस्या का समाधान केवल बड़े पुल के निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि वर्तमान स्थान पर स्थायी पुल निर्माण तकनीकी या आर्थिक दृष्टि से कठिन है, तो शासन-प्रशासन द्वारा वहां छोटे पुल, रपटा, पैदल पुल, सुरक्षित आवागमन मार्ग अथवा अन्य व्यवहारिक वैकल्पिक व्यवस्था की संभावनाओं का सर्वे कराया जा सकता है।ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें किसी बड़ी सुविधा की अपेक्षा नहीं, बल्कि ऐसी सुरक्षित व्यवस्था चाहिए जिससे बारिश के दिनों में भी वे अपने गांव से बाहर आ-जा सकें और आपात स्थिति में मरीजों अथवा शवों को नदी पार कराने के लिए जोखिम न उठाना पड़े।
सवाल सिर्फ पुल का नहीं, सुरक्षित जीवन का है
कढ़ाईखोदरा के नदी पारा में सामने आया यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—क्या कम आबादी वाले दूरस्थ पारे में रहने वाले लोगों को भी सुरक्षित आवागमन का अधिकार नहीं होना चाहिए? विकास का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब कम संख्या में रहने वाले परिवारों तक भी बुनियादी सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित हो। ग्रामीणों की परिस्थितियों को देखते हुए अब जरूरत है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर भौगोलिक स्थिति, नदी के बहाव, ग्रामीणों की संख्या और निर्माण की संभावनाओं का तकनीकी सर्वे कराए। यदि पुल संभव नहीं है तो कम लागत वाली वैकल्पिक व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि भविष्य में किसी ग्रामीण को अंतिम यात्रा के दौरान भी शव को कंधे पर लेकर उफनती नदी पार करने की मजबूरी न हो।

