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अंतागढ़ को जिला बनाने की मांग तेज, मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन

कोयलीबेड़ा एवं आमाबेड़ा क्षेत्र के लोगों ने प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की उठाई मांग

अंतागढ़। अंतागढ़, कोयलीबेड़ा एवं आमाबेड़ा क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, संघर्ष समिति एवं आम नागरिकों ने अंतागढ़ को स्वतंत्र जिला घोषित करने की मांग को लेकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। उससे पहले जिला निर्माण एवं विकास समिति के बैनर तले नगर में रैली निकाली गई। रैली में क्षेत्र के लोगों ने बड़ी संख्या में शामिल होकर अंतागढ़ को जिला बनाने की मांग को लेकर आवाज बुलंद की। रैली नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय पहुंची, जहां समिति के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के नाम SDM अंतागढ़ को ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में क्षेत्र की भौगोलिक, प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं विकास संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए अंतागढ़ को प्राथमिकता के आधार पर जिला बनाने की मांग की गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि कांकेर जिला मुख्यालय से क्षेत्र के अंतिम पंचायतों की दूरी लगभग 200 से 250 किलोमीटर तक है। इतनी अधिक दूरी के कारण ग्रामीणों को प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं न्याय जैसी मूलभूत सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे आम नागरिकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

पहले से मौजूद है उप-जिला स्तर का प्रशासनिक ढांचा

अंतागढ़ में पहले से ही अपर कलेक्टर (Additional Collector) तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (Additional SP/ASP) की पदस्थापना नियमित रूप से की गई है। क्षेत्र में उप-जिला स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था संचालित हो रही है। क्षेत्रवासियों का तर्क है कि जब प्रशासनिक ढांचा पहले से मौजूद है तो इसे जिला स्तर पर विस्तारित करने में व्यावहारिक कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान भी अलग

अंतागढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं सामाजिक विशिष्टता को भी जिला गठन का प्रमुख आधार बताया गया है। इसमें कहा गया है कि क्षेत्र की संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा-बोली, धार्मिक विश्वास एवं सामाजिक संरचना कांकेर और भानुप्रतापपुर से कई मायनों में अलग एवं विशिष्ट है। क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, जनजातीय बहुलता, लोक संस्कृति, लोकगीत, वाद्य यंत्र, मौखिक परंपराएं तथा प्राकृतिक एवं वन आधारित जीवनशैली को भी अलग पहचान का हिस्सा बताया गया है। दुर्गम वन क्षेत्र एवं पहाड़ी भू-भाग के कारण यहां की परिस्थितियां भी अन्य क्षेत्रों से भिन्न हैं।

आदिवासी बहुल एवं दुर्गम क्षेत्र, विकास की जरूरत

ज्ञापन में अंतागढ़ को अनुसूचित जनजाति बहुल एवं दुर्गम वन क्षेत्र बताते हुए कहा गया है कि स्वतंत्र जिला बनने से प्रशासनिक नियंत्रण, योजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी निगरानी बेहतर हो सकेगी। क्षेत्र के लोगों तक शासन की योजनाओं और मूलभूत सुविधाओं की पहुंच भी अधिक प्रभावी तरीके से सुनिश्चित की जा सकेगी।

खनन से नुकसान, विकास में हिस्सेदारी की मांग

क्षेत्रवासियों ने खनन गतिविधियों को लेकर भी चिंता जताई है। ज्ञापन में कहा गया है कि रावघाट लौह अयस्क परियोजना अंतागढ़ क्षेत्र से सीधे जुड़ी हुई है। खनन गतिविधियों के कारण सड़कों पर दबाव और प्रदूषण बढ़ने की बात कहते हुए क्षेत्र को DMF निधि का उचित लाभ नहीं मिलने का आरोप लगाया गया है। ज्ञापन में कहा गया कि खनन प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद विकास में पीछे रहना अन्यायपूर्ण है।

तीन सूत्रीय मांग रखी

संघर्ष समिति एवं क्षेत्रवासियों ने मुख्यमंत्री से तीन प्रमुख मांगें रखी हैं—

  1. अंतागढ़, कोयलीबेड़ा एवं आमाबेड़ा को मिलाकर अंतागढ़ को तत्काल स्वतंत्र जिला घोषित किया जाए।
  2. जिला गठन के संबंध में आवश्यक प्रशासनिक जांच एवं प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ की जाए।
  3. क्षेत्रवासियों की जायज एवं व्यावहारिक मांग को पूरा करने के लिए उचित निर्णय लिया जाए।

ज्ञापन में कहा गया है कि यह मांग किसी एक व्यक्ति अथवा संगठन की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के न्याय, विकास एवं आत्मसम्मान से जुड़ी मांग है। अंतागढ़ को जिला बनाने का निर्णय प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में ऐतिहासिक एवं जनहितकारी कदम साबित होगा, ऐसी उम्मीद क्षेत्रवासियों ने जताई है। ज्ञापन दिनांक 11 अगस्त 2026 को प्रस्तुत किया गया है।