विश्व आदिवासी दिवस पर उमड़ा जनसैलाब, 70–80 हजार लोगों की ऐतिहासिक भीड़ ने बुलंद की आदिवासी अधिकारों की आवाज
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने किया संबोधित, आदिवासी अधिकारों और उनके संवैधानिक संरक्षण के मुद्दों पर विस्तार से रखी अपनी बात
अंतागढ़। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर अंतागढ़ के नयापारा स्थित उन्मुक्त खेल मैदान में आयोजित जिला स्तरीय कार्यक्रम में रविवार को आदिवासी समाज का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम में करीब 70 से 80 हजार लोगों की मौजूदगी रही। छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे आदिवासी समाज के लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा, संस्कृति और उत्साह के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने मुख्य वक्ता के रूप में आदिवासी अधिकारों और उनके संवैधानिक संरक्षण के मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। डॉ. लक्ष्मण यादव ने आदिवासी समाज की विभिन्न मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के अधिकारों के लिए अनेक वीरों ने अपना जीवन न्यौछावर किया है। अब उनके संघर्ष और बलिदान का कर्ज चुकाने की बारी वर्तमान पीढ़ी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूंजीपतियों और बड़े कारोबारी हितों के कारण आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों और अधिकारों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि जिस जमीन, जंगल और प्राकृतिक संपदा पर आदिवासी पीढ़ियों से निर्भर रहे हैं, उस पर उनके अधिकारों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
15 सूत्रीय मांगों को लेकर उठी आवाज
कार्यक्रम में आदिवासी समाज की ओर से रखी गई 15 सूत्रीय मांगों का समर्थन करते हुए इनके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग की गई। संयुक्त ज्ञापन में आदिवासी समुदाय के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया गया है।
जनगणना में पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग
आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को संरक्षित करने के लिए आगामी जनगणना में पृथक ‘आदिवासी धर्म कोड’ शामिल करने की मांग की गई है। साथ ही आदिवासी पारंपरिक आस्था एवं विश्वास को वैज्ञानिक मान्यता देने तथा जनगणना में आदिवासी समुदाय की वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति का सही आकलन सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई।

परिसीमन में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुरक्षित हो
परिसीमन के दौरान अनुसूचित क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम नहीं करने और जिन क्षेत्रों की आबादी बढ़ी है, वहां आदिवासी समुदाय को उसके अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की मांग की गई। आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या एवं प्रभावशीलता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया।

स्थानीय भर्ती में आदिवासी युवाओं को प्राथमिकता
अनुसूचित क्षेत्रों में शासकीय एवं अर्धशासकीय सेवाओं में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने तथा इसके लिए आवश्यक नियम बनाने की मांग की गई। आदिवासी वर्ग को पदोन्नति एवं सीधी भर्ती में आरक्षण का प्रभावी लाभ दिलाने और जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग भी ज्ञापन में शामिल है।
निजीकरण पर रोक लगाने की मांग
अनुसूचित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, खनिज और वन जैसी सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण पर रोक लगाने की मांग की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों को मजबूत कर उनके माध्यम से स्थानीय रोजगार सुरक्षित करने पर जोर दिया गया।
जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा
आदिवासी समुदाय के पारंपरिक सामुदायिक संसाधनों जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई। भूमि अधिग्रहण एवं विस्थापन से संबंधित मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन, आदिवासी भूमि की गैर-आदिवासियों को खरीद-बिक्री पर प्रभावी रोक तथा नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग की गई।
भू-माफिया पर नियंत्रण के लिए कानून
अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी भूमि पर अवैध कब्जों की जांच कर विशेष भूमि-माफिया नियंत्रण कानून बनाने तथा अवैध रूप से हस्तांतरित आदिवासी भूमि मूल स्वामियों को वापस दिलाने की मांग उठाई गई।
ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य करने की मांग
भूमि अधिग्रहण, खनन, वन भूमि के व्यावसायिक उपयोग अथवा अन्य परियोजनाओं में ग्रामसभा की पूर्व सहमति अनिवार्य करने की मांग की गई। फर्जी ग्रामसभा एवं दबावपूर्वक सहमति के मामलों पर कार्रवाई तथा पूर्व में फर्जी ग्रामसभा के आधार पर स्वीकृत खनन अनुबंध और निविदाओं को निरस्त करने की मांग भी रखी गई।

खनिज संपदा में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी
खनिज संपदा से होने वाले लाभ में स्थानीय ग्रामसभा एवं आदिवासी समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की गई। प्रभावित ग्रामसभाओं एवं स्थानीय समुदायों को शेयर होल्डर बनाकर उन्हें होने वाले लाभ में हिस्सा देने तथा विकास कार्यों की जानकारी आम जनता को उपलब्ध कराने की मांग की गई।
निर्दोष आदिवासियों को नक्सल प्रकरणों से राहत
नक्सल मामलों में वर्षों से जेल में बंद निर्दोष आदिवासी युवाओं एवं ग्रामीणों के मामलों की उच्चस्तरीय समीक्षा कर उन्हें रिहा करने तथा लंबित मामलों में न्यायालय के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत कर उचित कार्रवाई की मांग की गई। दर्ज फर्जी मामलों की जांच और शीघ्र न्याय दिलाने के लिए विशेष व्यवस्था तथा जरूरतमंद बंदियों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की मांग भी रखी गई।
डीलिस्टिंग का विरोध
आदिवासी समाज में धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी आदिवासी को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने के प्रयासों का विरोध किया गया तथा आदिवासी पहचान को संवैधानिक एवं ऐतिहासिक आधार पर सुरक्षित रखने की मांग की गई।
देवगुड़ियों और सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण
देवगुड़ी, देवस्थल, सरना स्थल, गोटूल, घुमकुड़िया एवं अन्य पारंपरिक-ऐतिहासिक आस्था केंद्रों को सामुदायिक अधिकार और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत संरक्षित करने की मांग की गई। ऐसे स्थलों को राजस्व/वन अभिलेखों में दर्ज कर अतिक्रमण से मुक्त कराने की मांग भी शामिल है। साथ ही आदिवासी आस्था स्थलों का नियंत्रण किसी ट्रस्ट या सोसायटी को सौंपे जाने का विरोध किया गया।
पेसा कानून का प्रभावी क्रियान्वयन
पेसा अधिनियम के सभी प्रावधानों को धरातल पर प्रभावी रूप से लागू करने, ग्रामसभाओं को वास्तविक प्रशासनिक एवं आर्थिक अधिकार देने तथा अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा एवं पंचायतों को संवैधानिक भावना के अनुरूप अधिकार प्रदान करने की मांग की गई। नगर निकायों के गठन से जुड़े प्रावधानों को भी संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप लागू करने की मांग उठाई गई।
वन अधिकार कानून का पूर्ण क्रियान्वयन
वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत लंबित व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकार दावों का शीघ्र निराकरण, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा अभयारण्य एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में प्रचलित सामुदायिक अधिकारों की रक्षा करने की मांग की गई। वन भूमि के डायवर्सन में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की अनदेखी नहीं करने पर भी जोर दिया गया।
शिक्षा और मातृभाषा संरक्षण
आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास, छात्रवृत्ति और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाने तथा प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में उपलब्ध कराने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की गई। स्थानीय इतिहास, संस्कृति एवं परंपराओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग भी रखी गई।
पांचवीं अनुसूची और आदिवासी स्वशासन
पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को पूरी तरह लागू करने, अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन की संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत करने तथा जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) को अधिक सक्रिय एवं प्रभावी बनाने की मांग की गई। संयुक्त ज्ञापन में अनुसूचित क्षेत्रों की संवैधानिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया।
“अधिकार कागज पर नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए”
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि आदिवासी समाज के लिए बनाए गए संवैधानिक प्रावधान तभी सार्थक होंगे, जब उनका जमीनी स्तर पर ईमानदारी से पालन हो। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की लड़ाई विकास के विरोध की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और अधिकार आधारित विकास की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, भाषा और पहचान की रक्षा किए बिना वास्तविक विकास की कल्पना अधूरी है। उन्होंने समाज से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और संवैधानिक तरीके से संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में सर्व आदिवासी समाज के ब्लाक अध्यक्ष संतराम सलाम, विश्राम गावड़े, बद्री गावड़े, बीर सिंह उसेण्डी, मांझी सहित समाज प्रमुखों व समाज के युवाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
पुलिस प्रशासन रही मुस्तैद
विशाल जनसमूह के बीच आदिवासी संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। पारंपरिक वेशभूषा, आयोजन को आदिवासी संस्कृति और अस्मिता के रंग में रंग दिया। 70–80 हजार की भीड़ के बीच उठी अधिकारों की आवाज ने अंतागढ़ में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस कार्यक्रम को यादगार बना दिया। वहीं पुलिस प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था से कार्यक्रम बेहद शांतिपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय स्थिति निर्मित नहीं हुई ।

